उज्जैन, 17 सितंबर। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने, अवसरों को पहचानने और आत्मनिर्भर बनने का सामर्थ्य देना है।

इसी सोच को साकार करते हुए शासकीय कालिदास कन्या महाविद्यालय, उज्जैन में स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ के अंतर्गत आयोजित उद्यमिता एवं कौशल प्रशिक्षण ने छात्राओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की नई राह खोली।महाविद्यालय में आयोजित भैरवगढ़ बटिक प्रिंट प्रशिक्षण कार्यक्रम छात्राओं के लिए केवल एक प्रशिक्षण कार्यशाला नहीं रहा, बल्कि यह उनके लिए रोजगार से स्वरोजगार और निर्भरता से आत्मनिर्भरता की यात्रा का आरंभ बना।

उज्जैन की पहचान से जुड़ी भैरवगढ़ की पारंपरिक बटिक प्रिंट कला हमारी समृद्ध लोक एवं हस्तशिल्प परंपरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इस कला को बौद्धिक संपदा अधिकारों के अंतर्गत जीआई (Geographical Indication) टैग प्राप्त होना इसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करता है।

ऐसे में इस पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुँचाना और उसे आजीविका से जोड़ना सांस्कृतिक संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण पहल है।इसी उद्देश्य से महाविद्यालय में छात्राओं के लिए 15 दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया, जिसमें उन्होंने भैरवगढ़ की बटिक प्रिंट कला की बारीकियों को सीखा।

प्रशिक्षकों द्वारा उन्हें कपड़ों पर डिजाइन तैयार करने, रंगों एवं मोम की सहायता से बटिक तकनीक का प्रयोग करने तथा साड़ी, ड्रेस मटेरियल, चादर एवं अन्य वस्त्रों पर आकर्षक डिजाइनों को उकेरने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।प्रशिक्षण की विशेषता यह रही कि छात्राओं को केवल कला सिखाने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि कौशल को आजीविका और उद्यमिता में बदलने की दृष्टि भी विकसित की गई।

प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की प्रदर्शनी ने उनके भीतर अपने हुनर के प्रति विश्वास पैदा किया। उन्हें यह अनुभव हुआ कि उनके हाथों में केवल एक पारंपरिक कला सीखने का कौशल नहीं, बल्कि आय अर्जित करने और अपना छोटा उद्यम खड़ा करने की क्षमता भी है।प्रशिक्षण के बाद छात्राओं ने सीखे हुए कौशल को अपने घरों और स्थानीय स्तर पर प्रयोग करना प्रारंभ किया।

उन्होंने बटिक प्रिंटिंग, डिजाइनिंग तथा हस्तनिर्मित वस्त्रों के माध्यम से छोटे स्तर पर स्वरोजगार की शुरुआत की। कुछ छात्राओं ने परिचितों एवं स्थानीय ग्राहकों से ऑर्डर लेकर कार्य करना शुरू किया, जबकि कुछ ने अपने तैयार उत्पादों को प्रदर्शित एवं विक्रय करना प्रारंभ किया। इस प्रकार प्रशिक्षण कक्षा से निकलकर वास्तविक जीवन और आजीविका से जुड़ गया।इस पहल का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव छात्राओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास के रूप में सामने आया।

अपने कौशल से अर्जित आय ने उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाया और परिवार की आवश्यकताओं में सहयोग करने का अवसर दिया। छोटी-सी शुरुआत ने उनके भीतर यह विश्वास जगाया कि वे केवल नौकरी की तलाश करने वाली नहीं, बल्कि अपने हुनर के बल पर स्वयं रोजगार का सृजन करने वाली युवा उद्यमी भी बन सकती हैं।यह कहानी केवल कुछ छात्राओं के स्वरोजगार की कहानी नहीं है।

यह उज्जैन की पारंपरिक बटिक कला के संरक्षण, उसके पुनर्प्रसार और नई पीढ़ी को उससे जोड़ने की कहानी भी है।

एक ओर जहाँ जीआई टैग इस कला की विशिष्ट पहचान को संरक्षित करता है, वहीं महाविद्यालय का कौशल प्रशिक्षण इसे छात्राओं के हाथों में देकर परंपरा को आजीविका और विरासत को अवसर में बदलने का कार्य कर रहा है।स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ की यह पहल इस व्यापक सोच का सशक्त उदाहरण है कि उच्च शिक्षा जब स्थानीय कला, कौशल, उद्यमिता और रोजगार से जुड़ती है, तब वह छात्राओं के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकती है।“विरासत जब हुनर बनती है,हुनर जब रोजगार बनता है,और रोजगार जब आत्मनिर्भरता देता है—तब शिक्षा जीवन बदलने लगती है।”इस पहल ने छात्राओं को केवल एक पारंपरिक कला नहीं सिखाई, बल्कि उन्हें यह विश्वास दिया कि उनके हाथों का हुनर उनके बेहतर भविष्य की पूँजी बन सकता है।

यही कौशल विकास की वास्तविक सफलता है।